बहुमुख एक ऐसा सभागार हैं जहां दर्शक और अभिनेता लगभग एक ही धरातल पर मौजुद होते हैं वहां नाटक का मुख्य हिस्सा संपन्न होता है.
5.
(महाभारत, कृ. क.त., पृ. ७-८) आधुनिक विचार धारा इस बात को इस प्रकार कहती है कि जहाँ-जहाँ मानव के बहुमुख उत्कर्ष के साधन लभ्य हुए, वहीं-वहीं तीर्थों की परिकल्पना हुई।
6.
(महाभारत, कृ. क.त., पृ. ७-८) आधुनिक विचार धारा इस बात को इस प्रकार कहती है कि जहाँ-जहाँ मानव के बहुमुख उत्कर्ष के साधन लभ्य हुए, वहीं-वहीं तीर्थों की परिकल्पना हुई।
7.
बहरहाल, ' बहुमुख ' जैसे छोटे प्रेक्षागृह को एक बेहतर भव्य सेट में तब्दील करने के लिए तथा नाटक के एक दृश्य के सत्य को तीन अलग-अलग कोणों से flash back की तरह प्रस्तुत करने के लिए, थ्रिल पैदा करने में प्रयुक्त संगीत के लिए आप रंजीत कपूर को सराह सकते हैं.