हम पूँजीवाद, सामन्तवाद, ब्राह्मणवाद एवम् पितृसत्तावाद का विरोध करते हुये अधिकार, समानता एवम् न्याय आधारित समाज की स्थापना के लिये संघर्षरत रहेंगे।
2.
खुद किसानों के बीच भी विनिमय की उन्नति, बाजार के असर और रुपये की शक्ति पितृसत्तावाद और उसके साथी तॉलस्तॉयवादी विचारधारा को हटाती जा रही है।
3.
दो: स्त्री और दलित लेखकों ने अपने-अपने विमर्शों तक ही अपने लेखन को (अपनी यथार्थ-दृष्टि और रचना-दृष्टि को भी) सीमित कर लिया और तेजी से बदलते भूमंडलीय यथार्थ को जान-बूझकर अनदेखा करते हुए या तो अमूर्त पितृसत्तावाद और ब्राह्मणवाद को कोसते रहे, या स्त्रीवाद को देहवाद और दलितवाद को जातिवाद में बदलकर यथार्थवाद से और भी दूर होते गये।