पद्य की गेयात्मकता का निर्वहन है और रचना मुक्तक काव्य के रूप में प्रस्तुत है.
2.
जब आप अनुनासिक व्यंजन (जैसे ङ, ञ इत्यादि) की बात रही हैं तो उसकी गेयात्मकता में कुछ कमी दिख रही है, संभव हो तो दुबारा संपादित करके देखें।
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जब आप अनुनासिक व्यंजन (जैसे ङ, ञ इत्यादि) की बात रही हैं तो उसकी गेयात्मकता में कुछ कमी दिख रही है, संभव हो तो दुबारा संपादित करके देखें।
4.
पंकज जी की कविताओ की गेयात्मकता को आधार मानते हुए एक अन्य प्रतिष्टित कवि-लेखक व एस. के. विश्वविद्यालय, दुमका, के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर डा. राम वरण चौघरी अपने लेख “ गीत एवं नवगीत के स्पर्श-बिन्दु के कवि ' पंकज ' ” मे कहते हैं कि-” आचार्य पंकज के गीत ही नहीं, इनकी कविताएं-सभी की सभी-छंदों के अनुशासन में बंधी हैं.
5.
गद्य को तो कवियों की निष्कर्ष की वाणी कहा गया है, गद्य को समझना भी कुछ आसान सा लगता है कितु पद्य में कभी कभी शाब्दिक क्लिष्टता के कारण भाव अभिव्यंजना को स्पष्ट कर पाना कठिन सा लगता है यो तो पद्य में गेयात्मकता, स्वर बद्धता, चपलता, और सौम्य सा निखरता है और पढने में सुगम हो जाता है किन्तु पाठक को भाव स्पष्ट करने में कठिनाई भी होती है.