जब अनर्थकता के ढ़ेरी जमाते हैं, तो खाई कहीं खुदाते हैं
2.
मृत्यु के आधुनिक अस्तित्ववादी आतंक और तज्जन्य अनर्थकता से सर्जनात्मक होकर ही उबरा जा सकता है।
3.
यहाँ इसकी अनर्थकता दिखायी देती है | संस्कृत में ऐसी असंगति उत्पन्न नहीं होती | एक घनपाठ में प्रथम और अंतिम पदों को छोड़कर बाकि के प्रत्येक पद का कम से कम तेरह बार पुनरावर्तन होता है | (आप ऊपरलिखित ‘ पशूनां ‘ शब्द से इसकी जाँच कर सकते हैं.)
4.
फ़िल्म माध्यम की अपनी नैतिकता से लेकर इसमें महिलाओं और साहित्यकारों के काम करने के औचित्य, उसकी ज़रूरत, भाषा व विषय-वस्तु, नाटक / पारसी रंगकर्म / साहित्य से इसके संबंध से लेकर विश्व-सिनेमा से भारतीय सिनेमा की तुलना, सेंसरशिप, पौराणिकता, श्लीलता-अश्लीलता, सार्थकता / अनर्थकता / सोद्देश्यता आदि नानाविध विषयों पर जानकार लेखकों ने क़लम चलाई।
5.
“ रे मन गाफिल गफलत मत कर ” ………………………………………………………………………….. Look at the absurdity of Sadhana ji ' s mind ….! अभी ‘ ReEvaluation ' ब्लॉग की लेखिका साधना जी ने एक बड़ा ही अजीबो-गरीब लेख लिखा ‘ आत्म-साक्षात्कार …. ' इस लेख की अनर्थकता समझने जैसी है, क्योकि इससे हमे पता चलेगा कि एक बेहोश आदमी का दिमाग कैसे काम करता है ………..