किंतु यह सब फिजूल की बब-बक करने का मुझमें धीरज नहीं है.... मैं कहता हूँ, तुम जाओ! अध:पतन के पंक की ओर पाँव बढ़ाकर खड़े-खड़े हमें भी क्यों डरा रहे हो!”
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‘संस्कार, धर्माचरण' ये शब्द ही समाजसे लुप्त होते जा रहे हैं, जिससे समाजका बडी मात्रामें अध:पतन होना: जैसे-जैसे शिक्षापद्धतिपर पाश्चात्य संस्कृतिका प्रभाव पडता गया, वैसे-वैसे शालाके शिक्षकमें भी परिवर्तन होता गया ।
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किंतु यह सब फिजूल की बब-बक करने का मुझमें धीरज नहीं है.... मैं कहता हूँ, तुम जाओ! अध:पतन के पंक की ओर पाँव बढ़ाकर खड़े-खड़े हमें भी क्यों डरा रहे हो!” विनय हँस पड़ा।