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सूर्य सा उदाहरण वाक्य

उदाहरण वाक्य
31.गौतम बुद्ध के जन्म से कुछ दिन पहले उनकी माता रानी माया ने स्वप्न में एक सूर्य सा चमकीला, 6 दांतों वाला सफेद हाथी देखा था, जिसका अर्थ राज्य के मनीषियों ने एक उच्च कोटि के जगत प्रसिद्ध राजकुमार के जन्म का सूचक बताया, जो सत्य हुआ।

32. / कह रहे हैं अग्नि को साक्षी बनाकर / सूर्य सा संकल्प लेकर हम जलेंगे / साथ रहता एक दूजे के निरंतर / हम तिमिर से भोर होने तक लड़ेंगे / आज की इस रात आता है कोई आशीष देने / उस प्रतीक्षा पर्व को पावन बनाने / आज फिर जलते दियों का रतजगा है. '

33.मचा रहे थे / आज उसके पेट में? / अनहद सी / बज़ रही थी लड़की / कांपती हुई / लगातार थे / उसकी जंघाओं में / इक्तारे / चक्रों सा / काँप रही थी वह / एक महीयसी मुद्रा में / गोद में छुपाए हुए / सृष्टि के प्रथम सूर्य सा दीपित / लाल लाल तकिया... ”

34.एक द्वंद में उलझा हुआ एक आग में झुलसा हुआ अंतर्मन खड़ा है आज किस बात पर अडा है आज कभी सूर्य सा उज्जवल है ये कभी छाया काली रात सा है ख़ुद में सवाल सा चट्टान में दरार सा अपने आप में उलझा हुआ अपनी आग में झुलसा हुआ हर चक्रवियु को भेदने की जिद पर अडा है आज फिर सम्मुख अंतर्मन खड़ा है आज ।

35.अंतर्मन एक द्वंद में उलझा हुआ एक आग में झुलसा हुआ अंतर्मन खड़ा है आज किस बात पर अडा है आज कभी सूर्य सा उज्जवल है ये कभी छाया काली रात सा है ख़ुद में सवाल सा चट्टान में दरार सा अपने आप में उलझा हुआ अपनी आग में झुलसा हुआ हर चक्रवियु को भेदने की जिद पर अडा है आज फिर सम्मुख अंतर्मन खड़ा है आज ।

36.न कोई कल्पवृक्ष न कामधेनु न सपने में कोई देवता आएगा पृथ्वी का दुख हरने दुखों के व्रण बस रिसते रहेंगे मंदिरों के घंटे बजते रहेंगे कठमुल्ला भी कलमा पढ़ते रहेंगे न वेद न संविधान अबलाओं की लुटती अस्मत बचाएँगे न नेता न मंत्री न सरकारें बचा पाएँगे हत्यारों से निरीह जनता यह जनतंत्र भीड़तंत्र का रचाव मात्र होगा जो सुबह की छाती पर रोज़ उठेगा धधकता सूर्य सा पर ढल जाएगा क्षितिज पर हर-सा।

37.जो लोग थे जटिल वो गए हैं जटिल के पास मिल ही गए सरल को हमेशा सरल अनेक बिखरे तो मिल न पाएगी सत्ता की सुंदरी सयुंक्त रह के करते रहे राज ' दल' अनेक लाखों में कोई एक ही चमका है सूर्य सा कहने को, कहने वाले मिलेंगे ग़ज़ल अनेक “पेड़ तन कर भी नहीं टूटा ” किताब जिसे अयन प्रकाशन, महरौली, दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है में ज़हीर कुरैशी साहब की चुनिन्दा एक सौ एक ग़ज़लें शामिल की गयी हैं.

38.तू जन्मों से संचित किसी पुण्य के फल सी, मन के मरुस्थल में बूँद बन के आई है, जब तुझको देखा तो ऐसी अनुभूति हुयी, जीवन में रुनझुन है गूंजी शहनाई है, नवयुग की नव बेला राह देखती तेरी, तू इसमें जीवन की परिभाषा बन जाना, प्रकृति का तेज त्याग तप तुझमें वास करे, तू दृढ संकल्पों की अभिलाषा बन जाना, तेरा अस्तित्व रहे सदा सूर्य सा दीपित, तेरा प्रवाह, बहें गंगा के धारे ज्यों, तेरे आने से बिटिया मौसम यूँ महका है, फूलों की बगिया में आई हों बहारें ज्यों.

39.तू जन्मों से संचित किसी पुण्य के फल सी, मन के मरुस्थल में बूँद बन के आई है, जब तुझको देखा तो ऐसी अनुभूति हुयी, जीवन में रुनझुन है गूंजी शहनाई है, नवयुग की नव बेला राह देखती तेरी, तू इसमें जीवन की परिभाषा बन जाना, प्रकृति का तेज त्याग तप तुझमें वास करे, तू दृढ संकल्पों की अभिलाषा बन जाना, तेरा अस्तित्व रहे सदा सूर्य सा दीपित, तेरा प्रवाह, बहें गंगा के धारे ज्यों, तेरे आने से बिटिया मौसम यूँ महका है, फूलों की बगिया में आई हों बहारें ज्यों.

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